संकट: सोने के भाव बिकने वाली कीड़ा-जड़ी की चमक पड़ी फीकी, 16 लाख से घटकर 4 लाख रुपये किलो पहुंचा
भावचीन से मांग घटी तो बेशकीमती कीड़ा-जड़ी के खरीदार भी गायब, 4 से 6 लाख रुपये किलो कीमत पर भी नहीं बिक रही जड़ी-बूटी; सीमांत के हजारों परिवारों की आजीविका पर संकटउत्तराखंड। कभी सोने के भाव बिकने वाली हिमालय की बेशकीमती जड़ी-बूटी कीड़ा-जड़ी (यार्सागुम्बा) के दाम में भारी गिरावट ने सीमांत क्षेत्रों के ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग कमजोर पड़ने से कीड़ा-जड़ी की कीमत लाखों रुपये प्रति किलो तक गिर गई है। हालात यह हैं कि जो कीड़ा-जड़ी तीन से चार साल पहले 16 से 17 लाख रुपये प्रति किलो तक बिकती थी, आज उसका भाव घटकर करीब 3 से 4 लाख रुपये प्रति किलो रह गया है। इसके बावजूद खरीदार नहीं मिल रहे हैं।ग्रामीणों के मुताबिक, पिछले चार-पांच वर्षों से चीन की ओर से मांग में कमी आने के कारण कीड़ा-जड़ी के कारोबार पर लगातार असर पड़ रहा है। कभी इस बेशकीमती जड़ी-बूटी को बेचकर अच्छी कमाई करने वाले ग्रामीण अब इसे बेचने के लिए भी परेशान हैं। बाजार में मांग कमजोर होने के चलते 4 से 6 लाख रुपये प्रति किलो की कीमत पर भी कीड़ा-जड़ी के खरीदार नहीं मिल रहे हैं। इससे ग्रामीणों की मेहनत और उनकी सालभर की कमाई पर संकट खड़ा हो गया है।2000 परिवारों की आजीविका पर संकटकीड़ा-जड़ी की कीमतों में आई गिरावट का सबसे ज्यादा असर पिथौरागढ़ और चमोली जिले के सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले उन परिवारों पर पड़ रहा है, जिनकी आजीविका काफी हद तक इसके संग्रह और बिक्री पर निर्भर करती है। अनुमानित तौर पर करीब 2000 परिवार इस कारोबार से जुड़े हैं। इन परिवारों के लिए कीड़ा-जड़ी केवल एक बेशकीमती प्राकृतिक उत्पाद नहीं, बल्कि उनकी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का एक महत्वपूर्ण साधन भी है।मुनस्यारी, धारचूला और मल्ला जोहार के ग्रामीण हर साल मई-जून में बर्फ पिघलने के बाद ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में कीड़ा-जड़ी की तलाश में निकलते हैं। दुर्गम पहाड़ियों, कड़ाके की ठंड, ऑक्सीजन की कमी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच ग्रामीणों को इसे खोजने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। कई बार जान जोखिम में डालकर की गई यह मेहनत भी अब अपेक्षित आमदनी नहीं दे पा रही है।मेहनत ज्यादा, कमाई कम; खरीदारों का इंतजारग्रामीणों का कहना है कि कीड़ा-जड़ी की खोज में कई दिनों तक ऊंचाई वाले इलाकों में रहना पड़ता है। इस दौरान भोजन, रहने और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं पर भी खर्च होता है। पहले इसकी अच्छी कीमत मिलने से परिवारों की आर्थिक स्थिति को सहारा मिलता था, लेकिन अब बाजार में मांग घटने से हालात बदल गए हैं।कीमतों में भारी गिरावट के साथ सबसे बड़ी समस्या खरीदारों का नहीं मिलना है। ग्रामीणों के पास कीड़ा-जड़ी होने के बावजूद उसे बेच पाना मुश्किल हो रहा है। इससे उनकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा और परिवारों के सामने आर्थिक चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं।चीन की मांग में कमी बनी बड़ी वजहग्रामीणों के अनुसार, कीड़ा-जड़ी की कीमतों में गिरावट के पीछे चीन से मांग कम होना एक प्रमुख कारण है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग कमजोर पड़ने का सीधा असर स्थानीय कारोबार पर दिखाई दे रहा है। हालांकि, कीमतों में गिरावट के अन्य कारणों और वर्तमान अंतरराष्ट्रीय मांग की स्थिति की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है।अब आगे क्या?कीड़ा-जड़ी की कीमतों में लगातार गिरावट और खरीदारों की कमी ने सीमांत क्षेत्रों के ग्रामीणों के सामने भविष्य को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि बाजार में मांग नहीं बढ़ी और ग्रामीणों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिला, तो इसका असर इन परिवारों की आजीविका पर लंबे समय तक पड़ सकता है।ऐसे में जरूरत है कि कीड़ा-जड़ी के संग्रह से जुड़े ग्रामीणों की समस्याओं पर ध्यान दिया जाए। बाजार की वास्तविक स्थिति का आकलन करने, बिक्री के वैध और पारदर्शी माध्यम उपलब्ध कराने तथा स्थानीय लोगों की आजीविका को सुरक्षित रखने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।कभी लाखों रुपये किलो बिकने वाली कीड़ा-जड़ी आज खरीदारों की राह देख रही है। कीमतों में आई यह गिरावट सिर्फ एक बेशकीमती जड़ी-बूटी के कारोबार का संकट नहीं, बल्कि हिमालय के दुर्गम इलाकों में रहने वाले उन परिवारों की आर्थिक परेशानी की कहानी भी है, जिनकी उम्मीदें इसी पर टिकी हैं।
kamal bhandari editor in chief .

