सदियों पुरानी पाषाण युद्ध कला ‘बग्वाल’ को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में किए जा रहे प्रयास*

चम्पावत,

*सदियों पुरानी पाषाण युद्ध कला ‘बग्वाल’ को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में किए जा रहे प्रयास*

*देवीधुरा की ऐतिहासिक बग्वाल उत्तराखंड की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत का अनूठा प्रतीक**प्राचीन पाषाण युद्ध परंपरा को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए मा. मुख्यमंत्री के स्तर से किए जा रहे प्रयास*उत्तराखंड की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत और सदियों पुरानी पाषाण युद्ध परंपरा ‘बग्वाल’ को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए मा. मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के स्तर से निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। मा. मुख्यमंत्री का उद्देश्य देवीधुरा की ऐतिहासिक बग्वाल के गौरवशाली इतिहास, प्राचीन परंपरा और विशिष्ट सांस्कृतिक स्वरूप को देश-दुनिया के सामने लाने के साथ ही इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की दिशा में प्रभावी पहल करना है। बग्वाल को वैश्विक मंच पर पहचान मिलने से न केवल चम्पावत और देवीधुरा की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई मिलेगी, बल्कि उत्तराखंड की अमूल्य लोक परंपराओं को भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।जनपद के पाटी विकासखंड स्थित माँ वाराही धाम, देवीधुरा में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली ऐतिहासिक बग्वाल उत्तराखंड की उन विशिष्ट लोक परंपराओं में शामिल है, जिनमें आस्था, इतिहास, युद्ध-कौशल, लोक संस्कृति और सामाजिक समरसता का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। चार खाम और सात थोक के बीच खेली जाने वाली यह प्राचीन परंपरा सदियों से देवीधुरा की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।लोक मान्यताओं और ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, देवीधुरा की बग्वाल का संबंध प्राचीन काल की पाषाण युद्ध कला से रहा है। समय के साथ इस परंपरा ने अपना स्वरूप बदला और वर्तमान में माँ वाराही की आराधना के साथ फल एवं फूलों से बग्वाल खेले जाने की परंपरा विकसित हुई। इस प्रकार बग्वाल आज भी अपनी प्राचीन युद्ध परंपरा की स्मृति को जीवंत रखते हुए आस्था और भाईचारे का संदेश देती है।बग्वाल के दौरान वालिक, चम्याल, गहड़वाल और लमगड़िया चारों खाम पारंपरिक वेशभूषा एवं अलग-अलग रंगों की पगड़ियों में बग्वाल मैदान में प्रवेश करते हैं। शंखनाद और माँ वाराही के जयकारों के बीच शुरू होने वाली यह परंपरा देवीधुरा की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को प्रदर्शित करती है। विशेष बात यह है कि आयोजन के उपरांत प्रतिभागी एक-दूसरे से गले मिलकर वैर-भाव समाप्त कर भाईचारे और सामाजिक एकता का संदेश देते हैं।देवीधुरा की बग्वाल केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सदियों पुरानी सांस्कृतिक एवं पारंपरिक धरोहर है। यह प्राचीन पाषाण युद्ध कला अपने आप में अनूठी है और विश्व में इसकी विशिष्ट पहचान है। अतः इस गौरवशाली परंपरा को व्यापक वैश्विक पहचान दिलाने के लिए राज्य सरकार द्वारा इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।बग्वाल की इस ऐतिहासिक परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ ही इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देश-दुनिया तक पहुंचाना आवश्यक है। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में स्थान मिलने से देवीधुरा की बग्वाल को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलेगी तथा उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, प्राचीन परंपराओं और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर नई प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।राज्य सरकार का उद्देश्य बग्वाल जैसी प्राचीन लोक परंपराओं को केवल उत्सव तक सीमित रखना नहीं, बल्कि इनके इतिहास, परंपरा, लोक मान्यताओं और सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण करते हुए आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है। इसी क्रम में देवीधुरा की ऐतिहासिक बग्वाल को वैश्विक सांस्कृतिक पहचान दिलाने की दिशा में किए जा रहे प्रयास इसी संकल्प का हिस्सा हैं।

kamal bhandari editor in chief ।

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