21वीं सदी में भी झाड़ियों के सहारे मासूम! चम्पावत के लडाबोरा स्कूल में बदहाल शौचालयों ने खोली व्यवस्थाओं की पोल”

“21वीं सदी में भी झाड़ियों के सहारे मासूम! चम्पावत के लडाबोरा स्कूल में बदहाल शौचालयों ने खोली व्यवस्थाओं की पोल”

ग्रामीणों का फूटा गुस्सा— ‘हर साल बेमिसाल’ के दावों के बीच बच्चों का भविष्य बदहाल, जिला प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग।चम्पावत।सरकार जहां शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने और प्रत्येक विद्यालय में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावे कर रही है, वहीं चम्पावत जनपद की ग्राम पंचायत लडाबोरा स्थित उच्चतर प्राथमिक विद्यालय लडाबोरा की तस्वीर इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती नजर आ रही है।जनपद मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर अमोड़ी क्षेत्र के निकट स्थित इस विद्यालय में ग्रामीणों ने शिक्षा व्यवस्था और मूलभूत सुविधाओं की बदहाली पर गहरी नाराजगी जताई है। ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालय के शौचालय लंबे समय से जर्जर और अनुपयोगी बने हुए हैं। ऐसे में जब छोटे बच्चों को शौच के लिए जाना पड़ता है तो उन्हें मजबूर होकर झाड़ियों का सहारा लेना पड़ता है, जो न केवल असुविधाजनक बल्कि उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है।ग्रामीणों का आरोप है कि इस समस्या की जानकारी कई बार संबंधित कार्यदायी विभाग को दी गई, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं का लाभ कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका वास्तविक लाभ दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों तक भी पहुंचना चाहिए।ग्रामीणों ने न्यूज़ माध्यम से जिला प्रशासन और सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाते हुए मांग की है कि विद्यालय की मूलभूत व्यवस्थाओं को प्राथमिकता के आधार पर सुधारा जाए, ताकि बच्चों को सम्मानजनक और सुरक्षित वातावरण में शिक्षा मिल सके।ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से यह भी अनुरोध किया है कि समय-समय पर दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यालयों और सरकारी संस्थानों का स्थलीय निरीक्षण किया जाए, जिससे वास्तविक स्थिति सामने आ सके और समस्याओं का समय पर समाधान हो सके।ग्रामीणों का कहना है कि यदि आज बच्चों को बेहतर सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण वातावरण मिलेगा, तभी वे भविष्य में प्रदेश और देश का नाम रोशन कर सकेंगे।अब बड़ा सवाल यही है— क्या जिम्मेदार विभाग इस गंभीर समस्या का संज्ञान लेकर मासूम बच्चों को उनकी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराएगा, या फिर ये बच्चे आगे भी 21वीं सदी में झाड़ियों का सहारा लेने को मजबूर रहेंगे ।

Kamal bhandari editor in chief ।

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