नेताओं-अफसरों के लिए कुर्सियां तय, पत्रकारों के हिस्से आई सिर्फ खड़े रहने की जगह!

नेताओं के लिए कुर्सियां तय, अधिकारियों और अतिथियों के लिए भी इंतजाम; लेकिन खबर को जनता तक पहुंचाने वाले पत्रकार खड़े होकर करते रहे कवरेज मुख्यमंत्री जी के वर्चुअल कार्यक्रम को सफल और भव्य बनाने के लिए शासन-प्रशासन की तैयारियां साफ नजर आईं। कार्यक्रम स्थल पर अधिकारी मौजूद थे, जनप्रतिनिधि मौजूद थे, अतिथियों के लिए व्यवस्थाएं थीं और आयोजन को लेकर तमाम इंतजाम भी किए गए थे। लेकिन इस पूरी व्यवस्था के बीच एक अहम कड़ी शायद जिम्मेदारों की नजर से छूट गई—पत्रकारों के बैठने की व्यवस्था।कार्यक्रम में मौजूद पत्रकारों को कवरेज के दौरान बैठने के लिए एक अदद कुर्सी तक उपलब्ध नहीं हो सकी। नतीजा यह रहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारों को खड़े होकर ही कार्यक्रम की कवरेज करनी पड़ी।मामला भले ही देखने में छोटी-सी प्रशासनिक चूक लगे, लेकिन सवाल बड़ा है। जब किसी कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और अतिथियों के बैठने की व्यवस्था पहले से तय की जा सकती है, तो उसी कार्यक्रम को जनता तक पहुंचाने वाले पत्रकारों के लिए कुछ कुर्सियों का इंतजाम क्यों नहीं किया जा सकता?विडंबना यह है कि पत्रकार से उम्मीद की जाती है कि वह मुख्यमंत्री के वक्तव्य से लेकर शासन की योजनाओं और प्रशासन की उपलब्धियों तक हर जानकारी जनता तक पहुंचाए। लेकिन जब उसी पत्रकार की बारी आती है, तो उसके हिस्से में बैठने की जगह तक नहीं आती।ऐसा नहीं है कि पत्रकार किसी विशेष सुविधा की मांग कर रहे हैं। जरूरत सिर्फ इतनी है कि उन्हें भी कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हुए बुनियादी सम्मान और सुविधा दी जाए।कुर्सियों की व्यवस्था में नेताओं के लिए जगह थी, अधिकारियों के लिए जगह थी और अतिथियों के लिए भी विशेष इंतजाम थे। लेकिन पत्रकारों के लिए मानो संदेश यही था—“जहां जगह मिले, वहीं खड़े हो जाइए… खबर तो खड़े होकर भी लिखी जा सकती है!”यह स्थिति इसलिए भी सवाल खड़े करती है क्योंकि पत्रकार केवल कार्यक्रम देखने के लिए वहां मौजूद नहीं होते। वे कार्यक्रम की जानकारी, मुख्यमंत्री के संबोधन, योजनाओं और प्रशासनिक गतिविधियों को जनता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाते हैं।अगर किसी आयोजन में पत्रकारों के लिए बैठने की बुनियादी व्यवस्था तक नहीं हो पाती, तो यह केवल अव्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि पत्रकारों के प्रति प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़ा करता है।उम्मीद की जानी चाहिए कि अगली बार ऐसे कार्यक्रमों की तैयारियों में मंच, कुर्सियों और अतिथियों के साथ-साथ पत्रकारों की सुविधा को भी प्राथमिकता दी जाएगी।क्योंकि पत्रकारों को कोई विशेष सुविधा नहीं चाहिए।बस इतनी उम्मीद है कि उन्हें भी इंसान, मेहनतकश कर्मी और लोकतंत्र के महत्वपूर्ण चौथे स्तंभ के रूप में सम्मान दिया जाए।आखिर खबर लिखने वाले हाथों को भी कभी-कभी एक कुर्सी की जरूरत होती है!

kamal bhandari editor in chief ।

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